मंगलवार, 24 जुलाई 2012

झूठ के पन्खो से आस्मा की बुलन्दिया

झूठ के पन्खो से, आस्मा की बुलन्दिया,
जनाब बस रोज, पन्ख ही बदलते रहे.
बे-पनाह ताकते, चन्गुल मे समेट कर,
ना जमीर जानिब, मोम से पिघलते रहे.

फ़न रहा सेन्ध-मारी, छल फ़रेब - चोरिया,
बक्शा नही किसीको, खुदी को छलते रहे.
मार दी इन्सानियत, सच को दफ़ना दिया,
सब्ज दरख्त की छाव, ए-सी लगा सोते रहे.

हर पहर चेहेरे नये, हर पहर की गल्तिया,
दूसरो को मार कर, खुद मौत से डरते रहे.
फ़ासले कम हो रहे है, आ रही है फ़ासिया,
रुर्ख रु खुद ही रहे, लोग आक-थू करते रहे.

बुधवार, 23 मई 2012

"आस्टेरिटी मीजर की.. इन ने भुज्ज मार दी"

सरकार सॊ रही है.. यु चादर चढाइ के....
चोर्टे सभी लगे है.. यु सेन्धे लगाइ के...

सरकार रही सुतली .. तो खुब माल लुटली...
चूस गये आम सभी.. ओ निगल गये गुठली....

जनता रही है सिसकती.. सरकार रही घिसटती...
पब्लिक रही है पिसती.. सरकार रही है हसती...

हर नाकामियो के जस्न.. पे मुरगे चबाइ के ...
खुद मिया मित्ठू बने..  है दारु चढाइ के...

कानून खुद बनाइ के.. खुद ही सेन्ध मार दी...
आस्टेरिटी मीजर की.. इन ने भुज्ज मार दी...

शुक्रवार, 4 मई 2012

प्रपन्ची पन्च और पूजा

इन दमकती बस्तिओ मे, ये चमकती हस्तिय़ा,
सख्सियत है बा-मुल्लमा, जो उतरनी चाहिये.

जो चमकते दिख रहे है, बस कान्च के फ़ानूस है,
इस रोशनी को मशालची, की नज़रे इनायत चाहिये.

ज्यो काइयो की झाइयो से, रतन अनगिनत फ़ूस है.
और खरा-खोटा जानने को, बस आग जलनी चाहिये.

खुद के हक मे फैसले, प्रपन्च ही तो है पन्च का,
जब निस्पछ्ता ही न्याय मे, सिद्धान्त होना चाहिये.

खुद को रेवडी बाट्ते जो, बेसरम - अन्धे है वो,
मै हू, ए मेरा है और, बस इसे ही मिलना चाहिये.

मै खुजाउ पीठ तेरी, और तू पिला दे दूध इसको,
जम गयी यह कीच, हिमनद सी खिसकनी चाहिये.

मल किया पानी मे तूने, और आद्तन वह उतरा रहा,
इस नरक को बहाने को, अब एक जल-प्रपात चाहिये.

यु..युकि :-

ईश सम पुजते जहा हो, पन्च-परमेस्वर सभी,
ऎसे पन्चो की वहा, अब चान्द पुजनी चाहिये.

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

जय गुरुदेव - "गुरु देवो भव"

आस्मा क्यो नीला लगे, और अग्नि क्यो पीली लगे.

जानते ही राज इनके जब, तिलिस्म सब यु ही भगे.


"तमसो मा ज्योतिर गमय" का ग्यान आवाहन लगे.
गुरु - मान का बट व्रक्छ, तब स्वत ही उर मे उगे.


शिस्य को गुरुर के काबिल, बनाये जो वही गुरु हो.
आस्था की अविरल धार, शिस्य मे तब युही सुरु हो.


कि .... गुरु गोविन्द दोऊ खडे, काके लागो पाय.
         बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो दिखाय.

शुक्रवार, 17 जून 2011

"खब्तिया"


गोया पहले तो खब्त था तू ना-गवारी से,

क्यु करके कुछ भी समझ मे नही आता.

अब तो तरस है बस तेरी कम-जहीनी पर,

यु कर के कुछ भी समझ मे नही आता.



सौ टके की मुर्गी पे हज़ार का मशाला,

गोया छोटा सा हिसाब तक नही आता.

खब्तिया फसल ओ खलिहान है जलाया,

पजामा फाडा और लिहाज भी नही आता.



युहि जाने क्यु खुदा बन के क्यू बैठा है,

जबकि असल मे कुछ करना नही आता.

अकल का दिवलियापन तो जरा देखो,

ठीक से नकल करना भी तो नही आता.

शुक्रवार, 27 मई 2011

"जो रोशनी रही भी थी, वो सलामत नही रही"

यु हि हमने तमाम उम्र, अकेले सफ़र किया,
किसी हमसफ़र की, कोइ एइनायत नही रही.

यु कि मेरे जहा मे कोइ, नशेमन नही रहा,
अच्छा हुआ कि, इश्क की आदत नही रही.

हमने जो सच कहा, तो बुरा मान गये लोग,
यु झूठे ही चाप-लूसी, की आदत नही रही.

अदब मे सर झुकाया, तो खुदा बन गये लोग,
तह्जीब ओ नफ़ासत, ओ सराफ़त नही रही.

न घर, न मुकाम, न बस्ती, न सुबा, न वतन,
ओ घरोन्दो मे बसरे, की ओ चाहत नही रही.

जो मुस्कराये तो मिल के, लिया खैरो-खबर,
युहि रूठो को मनाने, की जिआरत नही रही.

कभी कुछ कहा तो, बस सलामती के लिये,
बस युही कोशने की, मेरी जलालत नही रही.

मिलते ही दीदरे तर, युही बेबाक क्या हुए,
गर्मिये-इश्क वही, पर ओ हरारत नही रही.

गुम्च ए चमन सी वही, सबनमी तर खुस्बू
बेदम दमे मरीज की, ओ सान्सत नही रही.

यु कर कि सर पे कोइ, छ्त भी तो नही रही,
खन्डहर खडे रह गये है, पर इमारत नही रही.

बदलते हालात मे सभी, यार कुछ यु बेजार हुए,
जो यारी बची नही रही, तो अदावत नही रही.

कैसे समा बचाये सनम, तेरी तस्नगी की हम,
जो रोशनी रही भी थी, वो सलामत नही रही.










मंगलवार, 10 अगस्त 2010

यथार्थ जब यु विषाक्त ह़ो जाये

यथार्थ जब यु विषाक्त ह़ो जाये, देह जब उगालदान ह़ो जाए,
इन्साफ रहे कामियो की लंगोटी में, देश तब नाबदान ह़ो जाए.

खुदी को खुद ख़त्म करना, महज क्यों है नारी की लाचारी,
क़त्ल अपना नहीं वाजिब, उडाओ सर, उठाओ खड्ग दो-धारी,

तू पतनी है, तू बहना है, तू माँ है जनमदाता, और तू ही काली,
बहादे रक्त आसुरो का, बुझा ले प्यास, तेरा खप्पर क्यों है खाली.